इक और जनम लेना होगा

तुम्हें जीवन संगीत बनाने को
एक और जनम लेना होगा

मैं गीत तुम्हारे लिखता हूं
तुमको शायद ये पता न हो
सब गीत तुम्हें सुनाने को
एक और जनम लेना होगा

तुम कालेज में संग पढ़ती थी
मैं तुम पर रचनाऐं लिखता था
पीछे की सीट पर बैठे बैठे
तेरे खाब पिरोया करता था
मुझे चाहत तेरी रहती थी
पर तुमसे कहने से डरता था
दिन में पागल सा फिरता था

रातों को जागा करता था
पर इतना था विश्वास मुझे
एक दिन तुमको मैं पा लूंगा
और फिर वो दिन जीवन में आ ही गया
यूं लगा के जीवन बदल गया
पहला पहला अहसास था वो

मेरी खातिर बड़ा खास था वो
फिर संग रहे हम कई वर्ष
सपनों की दुनिया में हमदम
हर बारिश में हम संग घूमे
तुमको लेकर ले बांहो मे
अफसानों के झूले झूले

लेकिन हमदम अपनी खातिर
विधि ने तो कुछ और ही सोचा था
हम बिछड़ गये दिल बिखर गये
अहसास सभी मृतप्राय हुए
सब विश्वास व्यर्थ गये हमदम
और व्यर्थ सभी अभिप्राय हुए

मैं दृष्टिहीन हुआ सावन में
मुझको तुम ही तुम दिखते हो
तुम गाथा हो मेरे जीवन की
मेरे यौवन का अधिकार हो तुम
तुम अर्थ मेरी हर रचना के
मेरी बुद्धि हो मेरी आकाँक्षा हो

मैं गीत तुम्हारे लिखता हूं
तुमको शायद ये पता न हो
सब गीत तुम्हें सुनाने को
एक और जनम लेना होगा

तुम्हें जीवन संगीत बनाने को
एक और जनम लेना होगा…..

~~ हिमाँशु ‘मोहन’

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