न कोई जीत आखरि हैं न कोई हार आखरि हैं

ना कोई जीत आखरि हैं न कोई हार आखरि हैं
जीवन नदि कि धारा हर घाट ये नई हैं
जो रहा धुरंधर वो भि यहा पर हारा
जो था डर के जीता वो भि यहा पर जीता
बदलाव के जड़ो मे कर्म,सोच और संगि हैं
जीवन नदी………….
खुद पे यकि तू प्यारे कभि छोर नहि देना
उम्मीद की कड़ी को तू तोर नहि देना
ये यकीन ही तुझे हर पल ताजा नया रखेगा
उम्मीद तुझ मे पल पल ऊर्जा नई भरेगा
ऐसे हि मेहनतो से तकदीर बदलती हैं
जीवन नदि…………
नदि गिर गिरि से बन जाति हैं वो झरना
चलति जो रहति समतल गतिहीन होति वरना
हर एक ठोकरे कुछ नई सीख दे जाती हैं
हर हार जीतने की तेहजीव सिखाति हैं
तप कर हि आखिर सोना कुन्दन बना करति है
जीवन नदि………….
देखता है क्या फकीरे हाथो कि तू लकिड़े
जिनके करम न होते उनके भाग्य सिर्फ सोते
मांगने कि छोर कर तू देने कि सोच प्यारे
देना हि आदमी का स्वाभिमान जगाति हैं
ये हि तो आखिर बेहतरि को जंग ठानति हैं
जीवन नदि………..

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