आफ़ताब रखते हैं (ग़ज़ल)

    1. कैसे हो पहचान अपने पराये की यंहा !
      लोग एक चेहरे पे कई नकाब रखते है !!

      दिलो में उठता दहकते अंगारे का शैलाब !
      लबो पे दिखावे की झूठी मुस्कान रखते है !!

      बरपा लो जी भर के सितम दीवाने पर !
      हम भी तुफानो से लड़ने का शौक रखते है !!

      कैसे मिटा पाओगे यादो को इस दिल से !
      वफ़ा की मसाल सीने में जला के रखते है !!

      चिराग जान कर बुझा न पाओगे “धर्म” को !
      हम भी घर में अपने कई आफ़ताब रखते हैं !!

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      डी. के. निवातियाँ ___________@@@