लौट आओ दादी..

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तुम्हारी बातें.. तुम्हारी यादें.. मुझे बहुत तड़पा रही हैं..
तुम अब कभी नहीं आओगी.. ये माँ मुझे.. समझा रही है..

लौट आओ दादी.. तुम्हे ढूंढता है मन..
कहाँ चली गयी हो.. बस यही सोचता है मन..

बार – बार मोबाइल से.. तुम्हारा नंबर डायल करता हूँ..
और कोई जवाब न मिलने पे.. मन ही मन मैं घुटता रहता हूँ..

तुम तो दादी.. मुझे कभी नजरअंदाज नहीं करती थी..
मैं तुम्हे कॉल करूँ.. तुम झट से.. हरा बटन.. दबाती थी..

अब क्या हो गया तुम्हे.. अब क्यूँ नहीं बात करती हो..
क्या हो नाराज मुझसे.. इसलिए गुस्सा करती हो..

माँ.. तुम दादी से.. बात कराओ.. मुझे उसे मनाना है..
उसके बिना.. मैं कुछ नहीं.. यह बात उसे समझाना है..

बार – बार बात कराने की जिद्द से.. जब माँ गुस्सा हो जाती है..
नहीं बात करा सकती.. रो – रो कर वो.. मुझे समझाती है..

तब बस.. अँधेरे मन से.. यही आवाज.. आती है..

लौट आओ दादी.. तुम्हे ढूंढता है मन..
कहाँ चली गयी हो.. बस यही सोचता है मन..

रह – रहकर बार – बार मुझे तुम्हारी याद आ रही है..
तुम्हारी हंसी भरी.. बातें.. मुझे आज बड़ा रुला रही हैं..

वो इन्टरनेट से तुम्हे.. बना – बना कर कहानी सुनाना..
आज बहुत याद आ रहा है..
तुम्हारा हंस – हंस कर मुझे चालुदास बुलाना..
आज इस मन को.. बहुत दुखा रहा है..

जब भी घर मैं आता था.. तुम दौड़ी चली आती थी..
गाँव से हर बार बिना थके.. असली दूध और दही लाती थी..

अब कौन आएगा हमारे घर.. जिसका हमें इंतज़ार होगा..
जब तुम ही नहीं होगी तो.. सब होकर भी.. बेकार होगा..

अभी तो बहुत सारी बातें.. बताना था तुम्हे..
तुम्हारी पसंदीदा जगहों को.. फ्लाइट से.. घुमाना था मुझे..

तुम वक़्त से पहले ही चली गयी.. सबकुछ छोड़कर..
अपने प्यारे मासूम बच्चे का दिल.. एक पल में तोड़कर..

हर बार जाते वक़्त.. मुझे बता तुम जाती थी..
मेरे मन ना.. होने पर भी.. हाँ मुझसे कहलवाती थी..

काश..!! तुम्हे जाने ना दिया होता उस दिन..
तो आज नहीं जीना पड़ता.. कष्ट में.. मुझे तुम बिन..

जब ये सारी यादें.. मुझे कांटे की तरह चुभ जाती हैं..
तब दिल से रो – रो कर बस यही आवाज़ आती हैं..

लौट आओ दादी.. तुम्हे ढूंढता है मन..
कहाँ चली गयी हो.. बस यही सोचता है मन..

आँखों से बहता.. आंसू का कतरा.. जब मुझसे.. तुम्हारा पता पूछता है..

बेबस.. उदास.. अकेला.. मेरा मन.. बस मौन.. हो जाता है..
रोते – रोते लिपट तकिये से.. ना जाने कब.. सो जाता है..
और सुबह उठने पर भी.. खुद को फिर.. वहीँ फंसा पाता है..

तब वापस दुहरा पाता है मन.. बस यही दो वचन..

लौट आओ दादी.. तुम्हे ढूंढता है मन..
कहाँ चली गयी हो.. बस यही सोचता है मन..

तुम्हारा..
चालुदास ( पंकज )

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