उलझन

ये कैसी उलझन है,
उलझन है या बंधन है?
कितना मुश्किल और आसान है,
प्रकट होना मन की भावनाओं का|
ये ख़ुशी,ये गम,ये प्यार,ये उपेक्षा,
मिलकर स्थिति कितनी गरीब है|
ऐ अंतर्मन! तुम क्या समझो,
ये दुनियादारी कितनी अजीब है|
भावनाओं की इस भीड़ में,
मुखौटों की भरमार है|
प्यार का सुख और उपेक्षा की मार,
कितनी प्यारी,कितनी उदार है|
भय लगता है अब जीने में,
मधुरता कब कर्कश हो जाए|
वचनों के इस इंद्रजाल में,
बढ़ते कदम न पिछड़ जाएँ|
ऐ दिल हसरतें जीवित रखना,
कहीं अर्थी न उठानी पड़ जाए|
मंजिल तक पहुँचने तक कहीं,
वक्त ही न गुजर जाए|
तुलिका की खोज है जारी,
रंगों के हसीन स्वप्न ताजे हैं|
इन्हें मलिन न होने देना ऐ मन!
मंजिल तक पहुँचने की ललक,
उपेक्षा का शिकार न बन जाए|

-सन्ध्या गोलछा

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