चुनावी सरगर्मी

क्यों अंजना सा सोर है, क्यों आज ये
मन कहता है जरूर कोई अंजना सा सोर है।
घर से निकला तो सुना आने-जाने वाले
लोगों से कि डालने जाना वोट है तब
जाना क्यों अंजना सा सोर है।

सब प्रतिनिधीयों के बीच
सिर्फ झूठे सिद्धांतों को लेकर नोक-झोक है
हांथ जोड़ते पैर पड़ते और कहते
हम आपके सुख-चिंतक बेजोड़ है
तब जाना क्यों अंजना सा सोर है

अपने को सर्वसाधारण बतलाते
किसान-मज़दूर के नेता कहलाते
गांव-घर आते जाते और लगते
गुहार है कि हमी में डालना वोट है
तब जाना क्यों अंजना सा सोर है

जगह-जगह खाना बनवाते
जलसा करते
मर्दों को कपड़ा देते
औरतों को साड़ी
और कई झूठे वादे करते और कहते
हम आपके है रखवाले;
वोट को खरीदने देते नोट है
तब जाना क्यों अंजना सा सोर है

अब बीत गए दिन सोर के ख़त्म हुआ दिन
नोक-झोंक के वो खाना बनने के दिन जलसे के
दिन वो सब साथ ले गए क्योकि वो जा चुके हैं
जीत के आज ख़त्म हुआ दिन सोर के क्योकि
दिन बीत चुके है वोट के।

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