मामूली इंसान से

हर रोज,
ना जाने कितने लोग,
इस दुनिया से चले जाते है
कितनी अर्थियां सज जाती हैं .
एक दिन मै भी
उन लोगो की तरह ,
इस दुनिया से चला जाऊंगा .
मेरी लाश के पीछे ,
लम्बी भीड़ ना होगी
मेरे लाश को कफ़न के कपडे भी,
नसीब होंगे या नहीं,
“राम नाम सत्य है” की गूंज
मेरे कान सुनेंगे भी या नहीं .
मेरे लाश को मिलेंगे कंधे ,
इसकी भी क्या गारंटी होगी .
शायद नहीं ,
क्यों की मै मामूली इंसान हूँ .
अगर मै मर जाऊं ,
किसी बस के नीचे तो ,
शायद मेरे लाश की पोस्टमार्टम भी ना होगी .
बस इसलिए ,
जीना चाहता हूँ तब तक ,
जब तक मै,
मामूली इंसान से वैसा इंसान ना बन जाता ,
जिनके मौत पर लोग रोया करते है ,
जिनके लाश पर फूलो के हार चढ़ा करते है.

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