किस्मत की लकीरे

ठण्ड के ठिठुरते मौसम में ,
जब सूरज कोहरे से निकलने की,
हिमाकत नहीं कर पाता,
वो साढ़े तीन हाथ का लड़का ,
अपने साथ लाये बोरे में,
अपनी किस्मत को रखना चाहता है.
कभी कहीें कोई चीज ,
अगर मिल जाए तो ,
आँखों में चमक आ पड़ती है उसके.
कूड़े के ढेर छानते-छानते ,
जब हाथ आते है उसे ,
कुछ चंद सिक्के ,
देता है माँ की हथेली पर ,
और बड़े ही शान से कहता है,
माँ ,
मै अपने हाथों में लगे,
कालिखे धोकर आता हूँ.
मुझे डर है ,
इस बात का की ,
कहीं मिट ना जाये ,
मेरी किस्मत की लकीरे.

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