कोई अनुभव

कोई अनुभव नित सर पर मंडराएगा प्यारे
निशा की गोद में हँसता चाँद जगाएगा प्यारे

कोसों दूर तक गगन में तारों की टिमटिम
काली ओढ़नी पर जैसे सितारों की झिलमिल
सपनों के मनहर पर भरमा नेनों का मोती
देख निरन्तर स्मरण की अमिट श्रृंखला पिरोती
चंहुओर विस्तारित चाँदनी की उजली धोती
हिय आंगन चितवन को नित हरसाएगा प्यारे
कोई अनुभव नित सर पर मंडराएगा प्यारे

प्रभात के आंचल में खिलता समग्र जग
विस्तृत चंहुदेश मनभावन खग कलरव
सुरज की सिंदूरी लाली लगती मतवाली
नन्हे ऊंचे हरे पौधें के सुन्दर घन जंगल
प्रकृति की मनहर छआ नित मन भाएगा प्यारे
कोई अनुभव नित सर पर मंडराएगा प्यारे

कानों में मद्धिम इक अनभिज्ञ सी आहट
भिगोती जाती मधुरस में अन्तह पट
रह कर मन मन्दिर में करवअ लेती चाहत
हिलोरे लेता विह्वल होकर पलकों का पनघट
चित्त हुआ प्रीत में पटखनी खाकर बवरा सा
एक प्रतिबिम्बसलोना तेरा होश उड़ाएगा प्यारे
कोई अनुभव नित सर पर मंडराएगा प्यारे

तनमन प्रेम से कायल होगा बरबस
मन्द मन्द हवाओं से छेड़ेगा नवरस
घट पर डाका डालेगा देकर भरपट
बिन विचारे करेगा निछावर सरवस
दुनिया झूठी होगी सच्चा होगा तू ही
तुम को सिर्फ तुम्हारा चाह नजर आएगा प्यारे
कोई अनुभव नित सर पर मंडराएगा प्यारे

2 Comments

  1. rk sharmar 04/06/2015
    • sanjay kumar maurya sanjay kumar maurya 21/06/2015

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