ये मेरा मन क्यों पागल सा है

ये मेरा मन क्यों पागल सा है
सावन का आवारा बादल सा है

इस जग में रुप तेरा सलौना है
और खूशबू तेरा संदल सा है

क्यों लगता है तनहाई में अक्सर
मेरे सीने में कुछ हलचल सा है

जाने कहाॅ है खुदमुख्तारी साजन
सब तेरे आगे कायल सा है

हाय ये जुल्फों का घना अंधेरा
खो जाने दो ये जंगल सा है

तेरी बातें दिल छू जाती है मेरी
तेरा स्वर बिल्कुल पायल सा है

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