मेरा नीड़ कहां ?

मद मन्द पवन संग उड़ते उड़ते –
पूछा पन्छी ने साथी से –
“क्यों चुप हो’? “कुछ तो बोलो प्रिय –
मन की कुन्ठन कुछ खोलो प्रिय ‘!

खोया-खोया बोला पन्छी
“वह देखो _सन्ध्या घिर आई,
हर शाख शाख नगरी है बसी,
हर आंगन प्रेम की ज्योति जगी,
पर चल -चल के मैं हार चुका,
मेरे पन्खों में बल ना रहा,
ऐ मेरी प्रिया _तू मुझ को बता –
मेरा नीड़ कहां? मेरा नीड़ कहां? ”

“बड़ी देर हुई कहीं देखा था,
इक उपवन था मनमोहक सा,
तिनके कुछ चुनने था मैं लगा,
बस टूटा यहीं था मेरा सपना!

सपना तो गया -आशा ना गयी ,
उपवन _उपवन वह घूम गयी,
हर फूल _फूल से पूछ गयी –
मेरा नीड़ कहां? मेरा नीड़ कहां ?”

“सपना तो पीछे छूटा प्रिय ,
राहें कुछ आगे अब भी हैं –
कुछ और उड़ो, मत थको प्रिय,
देखो इक उपवन आगे है!
अब तो पतझड़ है भाग रहा –
होगा बसन्त का राज्य नया,
लिए प्रेम अमर हम बनाऐं गे –
इक नीड़ नया -इक नीड़ नया “!

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