नदी और नाला

!! नदी और नाला !!

नदी–
नदी का खुद का सम्मान है ,
पर उसे अभिमान है !
कहती वो गुमान कर ….
जा मिलती मै सागर पर !

बान्ध बने मै रुकू जहा पर ,
खेती करते लोग वहा पर !
जल देती मै पीने …..
जो बना सहार जीने का !

भवसागर वो पार किया ,
मुझमे जो स्नान किया !
बिजली देती हू पानी से ….
रोशन है जग मनमानी से !

रूप रन्ग से काला है
तू पापी गन्दा नाला है !
पला जैसे बन्दगी मे …
और सना तू गन्दगी मे !

कीडे-मकोडे पल रहे है ,
अस्थि-पन्जर गल रहे है !
मख्खी-मच्छर चूसते है …
लोग तुझ पे थूकते है !

सोचू गर जो रहम कर दू ,
छोटा सा एक धर्म कर लू!
सामिल कर लू समाज मे..
आया तू ऐसे अन्दाज मे !

बस इतना ही काम करता ,
कि मुझे बदनाम करता !
बडा बेआबरू बाला है
हा तू पापी गन्दा नाला है !

नाला-

रूप रन्ग से काला हू ,
हा ! मै पापी गन्दा नाला हू ,
जुल्म जिस पर ढा रही तुम
मै वही दिलवाला हू !

तू मा है , सब जन की
मै उनका ही बेटा हू!
तू दादीमा मेरी ,
मै तेरा ही पोता हू !

लोगो ने तुझे स्वीकारा है,
और मुझे धुत्कारा है ,
हा पैदा करके फेक दिया
न कोई मेरा ख्याल किया !

हर शाम जो नीलाम होती
जा रहीसो के साथ सोती ,
बचपने से ही ऐसा हू
मै उस अबला नारी जैसा हू !

हिन्सा की चोटिल गिरफ्त मे ..
कसमसा रहा मै तेरी जगत मे !
किसी के भी द्वार जाता ,
वो मुझे ऐसे भगाता …

दुआओ पे सन्ताप ही दे,
जैसे कमाई बाप की दे !
मै न होता गर यहा पर
मूत्र मल जाता कहा पर !!

(अनुज तिवारी ” इन्दवार”)

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