बचपन

कुदरत ने जो दिया मुझे ,
है अनमोल खजाना !
कितना सुगम सलोना वो
ये मुश्किल कह पाना !!

दमक रहा ऐसे मानो ,
सोने सा बचपना फिक्र !
फिक्र नही कल की
न किसी से सिकवा गिला !!

मित्रो की जब टोली निकले ,
क्या खाये ,बिन खाये !
बडे चाव से ऐसे चलते
मानो जन्ग जीत कर आये !!

कोमल हाथो से बलखाकर ,
जब करते आतिशवजी !
घुन्घरू बान्धे हुए पैर पर
तब चलती खुशियो की आन्धी !!

उन्हे देख मा की ममता का ,
उमड रहा सैलाब !
मन मन्दिर महका रहा
बगिया का खिला गुलाब !!

(अनुज तिवारी “इन्दवार”)

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 26/05/2015
    • Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari 27/05/2015

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