तुम्हें नहीं लगता

बहुत देर हो चुकी है

कहते कहते कि देर हो चुकी है

तुम्हें नहीं लगता?
वह सुकूनदेह झुटपुटा

जिसमें खुशी-खुशी

हम चलते चले आए थे

इसी चिपचिपे अंधेरे का बचपना था

और मिट्टी की वो भीनी गंध

सीलन का पहला भभका थी फकत
तुम्हें लगता है

समझ का यह बदलाव

हकीकतबयानी नहीं

सिर्फ उमर का खेल है?
हम इतने सारे लोग

यहां खुद को

यही समझाते आए थे

कि हमारे मन की तरंग

और तन के ताप से

पूरा दृश्य एक दिन

शीतल प्रकाश में नहा जाएगा

हालांकि ऐसे भ्रम की गुंजाइश

यहां कम ही थी
कितना समय हुआ

जब हममें से बोला था कोई पहली बार

‘देर हो चुकी है’?

और उसका हमने क्या किया?

हम अपने खलनायक

जरा जल्दी ही चुन लेते हैं

क्या तुम्हें नहीं लगता?
न जाने कितनी देर हुई तुम्हें

बोले यह वेदवाक्य

कि तुम्हारे कहने पर नहीं

अपनी मर्जी से हम यहां आए थे

इस मर्जी की तह में समझ तुम्हारी थी

यह समझने के लिए

इतना समय कम नहीं होता
और अब तो यहां

‘हम’ जैसा भी कुछ नहीं बचा है

अंधेरे में आमने-सामने

मैं हूं और तुम हो

और एक भुतही अनुगूंज

जो कोई सवाल हो सकती थी

जो शायद कोई

जवाब भी हो सकती थी
मेरे नायक

निकल जाने या खत्म हो जाने की

यह अंतिम दुविधा जीते

क्या तुम्हें नहीं लगता

कि बहुत देर हो चुकी है

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