माँ

कितना दुख अंंगीकार कर
नवमास का तप स्वीकार कर
जलपान के परहेज के मध्य
हृदय मेंं धारण किये संंकल्प
धरती पर उतारा किलकता नन्हा
नन्हा
वो नन्हा
जिसके नवनेत्र थे जग से अनजान
अंंग अंंग मेंं समाये थे
युग को परिवर्तित करने की शक्ति
पर वो था एकदम बेजान
भीषण ग्रीष्म मेंं तपते आम्र वृक्ष के मानिंंद
जो पानी के अभाव मेंं सूख जाये
मांं ने रूई के फाहे लेकर दूध मेंं
और उस फूल से होंंठो के बीच
बूंंद देकर नन्हे जीवन का पोषण किया
दिन प्रतिदिन अनगिनत मर्तबा
कपडे गीले हो जाते मलमूत्र से
निश्छल मन से सफाई करती
जब भी मुन्ना रोने लगता और चुप न होता
वह भी भर आती आंंखोंं मेंं आंंसू
लिए ममता व करूणा से
और कुछ छण भी दूर नहींं होने देती
लाडले को अपने आँचल की साये से
चूमती पूचकारती खिलाती नहलाती
बैठकर आँचल मेंं लिए सुलाती
तब तक सोती नहींं
जब तक मुन्नर सो न जाए
कितना स्नेह करती है वो अपनी बच्चे से
यही है उसकी ममता
और इसिलिए वो है मांं………………

2 Comments

  1. Sukhmangal Singh sukhmangal 22/05/2015
    • sanjay kumar maurya sanjay kumar maurya 21/06/2015

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