कोल्हू

माघ का हाड़ में कंपन मचाने वाला माह
कांपता किसान
उन के फटे चिथड़ों में,
अनवरत दौड़ता कोल्हू के चारो ओर
जोड़ीदार बैलों के पीछे
रुकता नहीं कदापि
संभवत: कि –
समय से आगे निकलने की चाह हो ।

एक अधेड़ स्त्री
गन्ने की पोटली के समीप बैठी
डाल रही है
एक साथ कई गन्ने
लोहे क दो बेलनाकार
चलती पाटों के बीच

पीस रहा है गन्ना
निकल रहा है रस
और दूसरी ओर
बेरस हुए गन्ने का चिपटा हुआ तना
जिसे हम कहते है चेफुआ
अक्सर गावों में
रस उड़ेलता है कड़ाहे में
पकाता है खूब
आग की भठ्ठी में
जब तक महीया और
महीए के बाद गुड़ न बन जाए
सारा रस ।

इतने लोग जो
कोल्हू के पीछें हैं मग्न
गन्ना पेरने की कृया में संलग्न
वास्तव में पीस रहे हैं जीवन
गन्ने की भांति संसार रुपी कोल्हू में
इस अभिलाशा में की –
आगे का दिन लेकर आएगा सुनहला प्रात
रंग बिरंगी खुशियों के साथ
एकदम मीठे व महीए की तरह मधुर
और
इसी आश में हर साल
महीनों तक पेरतें हैं
कोल्हू में ईख व जीवन को
और हर साल आशाएं हो जाती है धूमिल।

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