काश ——(कविता)

काश ——(कविता)
काश ! कोई हमें बुलाता आवाज़ देकर ,
और अपने पास बैठता हाथ पकड़कर ,
जानने को वोह हमारा हाल-ऐ-दिल ,
पूछता हमसे बेहद ज़िद कर-कर .

काश ! कोई हमारी नब्ज़ पकड़ कर ,
हमारी तबियत का जायजा लेकर ,
पूछता ” तुम ठीक तो हो , कैसा है हाल ?
कह दो सब ! मत रखो कुछ छुपाकर .

काश ! कोई हमारी पेशानी पढ़कर ,
और कभी आँखों में गहरा झांक कर .
पूछता हमसे हमारी परेशानी का सबब ,
हमारी उदासी की फ़िक्र में रहता हर पहर .

काश ! किसी के पास होता इतना वक्त ,
बैठकर हम घंटो बतियाते वक़्त-बेवक्त ,
कभी -रूठना – मनाना ,कभी शिकवा-शिकायत .
पल में गुज़र जाता हर उबायु वक्त .
काश ! हमारी पलकों की नमी देखकर ,
रह जाते उसकी आँखों में आंसू थमकर ,
हमारी हँसी औ मुस्कान को वापिस पाने को ,
वोह सदा देता जी-जान एक कर .
काश ! हमारी हर उम्मीदों पर खरा उतरकर,
हमारी हर ज़रूरत को तहे-दिल से समझकर ,
पूछता हमसे ”और बताओ तुम्हारी आरजू क्या है ?
अपनी तमन्नाओ को ज़ाहिर करो दिल खोलकर .”

काश ! किसी को होती हमसे इतनी मुहोबत ,
अपने गुस्से औ गुरुर को कर देता रुखसत ,
हमारी कमियों , कमजोरियों को ज़माने से छुपाकर ,
हमारे फन औ खूबियाँ को देता नयी शक्ल- सूरत .
मगर यह सब तो हैं ख्वाबों -ख्यालों की बातें ,
”काश ” तक ही तो सिमटी हैं सारी हसरतें ,
यह कडवी हकीक़त है ,ऐ अनु ! इतना समझ ले ,
इसी उम्मीदी -नाउम्मीदी में जीती हैं तमाम जिस्तें .

4 Comments

  1. rakesh kumar rakesh kumar 23/05/2015
  2. Onika Setia Onika Setia 23/05/2015
  3. sarvesh singh sameer sarvesh singh sameer 27/05/2015
    • Onika Setia Onika Setia 27/05/2015

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