ख़ामोशी

कहते है ख़ामोशी
बोलती है,
राज़ सारे दिल के,
खोलती है,
ख़ामोशी की जबान,
समझना चाहता
है कौन?
ज़ख़्म पर मरहम,
लगाना चाहता
है कौन?
बोलने वालों को,
ही जब दुनिया
समझती नहीं है,
मरहम दिल पर
रखती नहीं है,
तो बेजुबान को,
समझेगा कौन?
ख़ामोशी की जबान को
समझेगा कौन ?

बी. शिवानी

5 Comments

  1. bimladhillon 24/05/2015
    • भारती शिवानी 24/05/2015
  2. sarvesh singh sameer sarvesh singh sameer 26/05/2015
  3. Grijesh shukla 29/05/2015
    • भारती शिवानी 29/05/2015

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