चादर तेरे प्रित की

एक चादर तेरे प्रित की
ओढे बैठा हूंं
कि जैसे ठंंड की मौसम मेंं
ठंंड मेंं ठिठुरता मनई
फूंंस के झोपडी के अन्दर
बैठकर टुकुर टुकुर
कैरोसीन की तेल वाली ढिबरी
के जलते हुए दीया को देख रहा हो
और बाती और लौ के
प्रगाड संंबंंध की अनुभूति कर रहा हो
और चादर की आगोश से प्राप्त
ऊष्मा से तृिप्त
स्वयंं को ठंंड मुक्त
आभास कर रहा हो
ठीक ऐसे ही
तेरे प्रित की चादर हैंं
मेरे शरीर की खातिर
मेरे आत्मा की खातिर
मेरे सर्वत्र के लिए
मेेरे जीवन के लिए………..

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