पूनम का चाँद

जाडे का माैसम
पूर्णमासी का दिवस
ईस माैसम व ईस दिन के
मिलन के संंयोग मेंं
अक्सर अंंबर निश्छल होता है
पर आज ऐसा नहींं है
कदापि नहींं है
हवाएंं सिहिर सिहिर चल रही हैंं
रजाई से बाहर निकलने पर आत्मा तक कांंपती है
बादलोंं का पहले की तुलना मेंं
तेज गति से आवागमन हो रहा है
और मैंं झोपडी के अंंदर
छोटी सी खटिया पर
रजाई मेंं कसकर लिपटा हुआ
टांंटी के झुरमुटोंं के बीच से
आसमान मेंं निहार रहा हूंं
देखता हूंं वह पूर्णिमा का चंंद्रमा
बडा ही उज्जवल है
तथा अपनी संंपूर्ण कला को
प्रकट कर रहा है
उसकी दुधिया रौशनी
समस्त वसुन्धरा को
प्रकाशित कर रही है
सारा वातावरण
आलोक मेंं स्नान करता दिखाई देता है
इसी मध्य चंंद्रमा
सफेद बादलोंं के संंघ संंघ
चोर सिपाही खेलता है
बिल्कुल उन छोटे बच्चोंं की तरह
जो अक्सर घर की कोनो मेंं
या फिर पडोस की गलियोंं मेंं
खेलते हुए नजर आते हैंं
और तारे भी चंंद्रमा का
बखूबी साथ दे रहे हैंं
और मैं इस खेल का दिग्दर्शक हूंं………….

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