यादोंं की चाह

अचानक वो अा जाती है
बिना बताये, बिना आज्ञा के
निसंंकोच निश्छल
केवल बीते हुए कल की गाथा लिए
मेरे दिल मेरे दिमाग में बसेरा करती है
जैसे ये सब कुछ उसी का तो है
इसी तरह
मेरे वर्तमान में शामिल होकर
मुझसे कहती है
सर्वदा तेरा साथ न छोडूंंगी
और तुम्हारे जीवन के प्रत्येक छड के
खयालो मेंं शामिल रहूंगी
तुम मगर जग मे बता भी न सकोगे
कि मैं तेरी हूँ
तो कोइ मुश्किल नहीं
मै तो सिर्फ इतना चाहती हूं
कि कोइ मुझे चाहे या न चाहे
समझे या न समझे
जाने या न जाने
मगर तुम चाहो, समझो व जानो
इसी में मुझे पूर्ण संन्तुष्टी है
और मेरा वजूद भी ।

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