ईच्छा

चंंचल है
पगली है
घमंडी भी है
किसी की सुनती नही
किसी की मानती नही
हठ के सिवा कुछ जानती नहीं
निर्बाध है
बेजोड है
स्वतंत्र है
जहां मर्जी जब मर्जी
वह जाती है
बिना रोक टोक के
जाकर ईर्द गिर्द मंडराती है
थक जाती है तब लौट आती है
आकर सीने के भीतर
हंगामा मँचाती है
और ज्वालामुखी के लावा के मानिंद
फूटटी बिखरती रहती है………….

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