हा उसने कहा था …….!

एक रोज सुबह उठ कर मै
झील किनारे बैठा था ,
मन्द पवन यू मस्त्त
झकझोर रही थी पीपल को !
पंछी डाल पे बैठ झूमते
सन्गी संग इठलाते थे ,
और फुदक-फुदक कर जैसे
चूम रहे हों बादल को !!

झील किनारे एक पुराना
बना हुआ मन्दिर शिव का ,
नित्य सुबह वो दर्शन करने
थाल सजा कर आती थी !
एक रोज सुबह ,
मिल गये नयन ,
आयी थी वो , ताम्रपात्र मे भरने
पूजा जल को. !!

झीनी साडी ढका बदन
जैसे चमन खिल रहा कही ,
पग चूम रहा तट पर पत्थर
जब मांजा रही थी पायल को. !
हलचल जल पर मचा रही
फुदक रही वो दुबक-दुबक कर,
सर से कर सरका रही
तब झर-झर बूंद गिरी जल को. !!

हठ कर-कर लत लपत रही
और वो सिमट गई उन पर ,
बदन कानन चन्दन सा
बाल काल से लपते है कन्गाल को !
बदन यौवन दहक रहा
मन बहक रहा म्रगनयनी को ,
चहक रहे खग मेरे दिल पे
बूँद-बूँद स्वाती जल को. !!

सुन्दर मधुर …… वो
बूँद-बूँद अम्रित की प्याली ,
बन सादगी जो टपक रही
डुबा रही मेरे दिल को !
खन-खन करती थी चूड़ियां
बन-ठन के जब निकल पडे ,
छम-छम करती घुँघरू पायल की
मार गई मुझ घायल को !!

सर्मीली सी नगर झुका कर
फिर नजर मिलाकर मुस्काती थी ,
इतना हंसी वो कल था कि
मै भुला सका न उस पल को !
नीलम जैसी आखे उसकी
और गुलाब सा बदन खिला ,
जैसे माली उस बगिया का मै
चाह रहा उस चन्चल को !!

इतनी पावन मनभावन
वो सनम भूमि थी मेरी ,
रहती जिसमे दिलरुवा
जो दिलोजन थी मेरी !
खुदा ने बक्सीस दिया
कुदरत को एक खजाना ,
जो मुमताज बन कर मिला
मेरे दिल के ताजमहल को !!

उसने कहा था, हा उसने कहा था
आगे आ ! थाम ले दामन मेरा ,
मै बेजुवान सन्कोची ठहरा
कुछ कह न सका उस निच्छल को ! !!

” पहल चारो ओर है हमारी जुदाई का
तेरी सहनाई और मेरी तन्हाई का ,
रुशवाई के हर आस-अहसास का
दफना दून्गा आज यादो के हर पल को !
वो न तो खफा है, न बेवफा है
हाँ वो मेरे दर्द-ए-दिल की दवा है ,
हम दोनो ने मिटाई ये दास्ताने मुहोब्बत
अब न सुनोगी कभी इस गजल को !! ”

(Anuj Tiwari)
कवि -अनुज तिवारी ” इन्दवार “