दो ख्वाब

बन्धन तोड़कर आई सारे
मन की सेतु पर दौड़ती
दूरियों की अथाह समुन्दर पार कर
जिस अंतर के बीच मन में
मिलने की चेष्टा नहीं रहती शेष
ऐसे में वह लेकर चल पड़ी
आंखों में एक दीद की उद्देश्य ।

उन्मुख हुआ दर्शन हेतु
दूर देशाउर लाॅघता हुआ
पगडंडीयों वीरानों के मध्य से होता
बेरोक तीव्रगामी कदमों से
जा मिला अपने मंजिल से
जिसके लिए जबसे था आतुर ।

घने जंगल थे
पर्वतों का एकान्त मंजर था
नहीं, फूलों की बगिया थी शायद
या फिर किसी बस्ती की अंधेरी गली
या नदी का किनारा
जहां झरने झर रहे थे झर झर
या इनमें से कोई नहीं
ठीक ठीक ज्ञात नहीं है मुझे ।

परंतु इतना आभास है
उस वातावरण में मिल रहे थे दो ख्वाब
प्रकृति को छोड़ अन्य की अनुपस्थिति में
एक दुजे से व्यथा सुना रहे थे अन्र्तमन की
कि हम साथ जीना चाहतें हैं
ये रोज का दुर्गम राहों से
होकर आना ठीक नहीं लगता
दिल में कचोंटे सहना
बेकल सा हर घड़ी रहना
आॅखों में आॅसू बनकर बहना
सब बड़ा ही पीड़ादायी है।

इतना जब ख्वाबों को
ख्वाबों की दृष्टी से देखा तो समझा
ख्वाबों को भी ख्वाबों से प्यार होता है।

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