!! प्रकृति !!

मान लिया, प्रकृति हो, बदलने का हक है तुम्हे।
पर क्या बीते लम्हों को बदल पाओगे, शक है मुझे ।।
जो मांगे कोई बारिश, उसे धुप से जलाते हो ।
जो धुप सेकने निकले तो बाढ़ में बहाते हो।।
अपनी ताकत पे क्यों इतना इठलाते हो?
अलग अलग नाम से यूँ तबाही क्यों फैलाते हो ??
कैसी ये रंजिश तेरी, कौन सी ये ख्वाहिश तेरी ?
सबकी आह लेने की, ऐसी भी क्या मज़बूरी??
प्रेम राग में छला क्या तु? विरह में क्या जल रहा तू?
किस भय से है भाग रहा, प्रलय बन क्यों भटक रहा तू??
है किसे खोने का डर, सबको है जरुरत तेरी।
विनाश के साथ साथ सृजन भी तो फितरत तेरी ।।

(Dedicated to the innocent lives lost in the earthquake in Nepal & India)

2 Comments

  1. rakesh kumar rakesh kumar 17/05/2015
  2. आलोक पान्डेय आलोक पान्डेय 20/12/2016

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