न मुज्हको तुम समज्हती हो…….

मुज्हे समज्हती रसोई , हलवाई समज्हता है
जमाना मेरी बातो की गहराई समज्हता है !
मै वो बकरा हू ! जिसकी पीदा कसाई समज्हता है
न मुज्हको तुम समज्हती हो, न तेरा भाई समज्हता है !!

दम तोदते अरमान मेरे यू घुत-घुत के
बर्बाद हो देखता, यहाअपनो को लुतते !
ऊसे समज्हाने का कोई मतलब न था
मेरी खामोशी को जो रुशवाई समज्हता है !!
न मुज्हको तुम……..

मेरी उल्फत मै कब तक च्हिपा के रखू
गमे-आशुओ से चहरा भिगा के रखू !
तरश आती उसे मेरी हालात पे
मेरी तकलीफो को तो मेरा भाई समज्हता है
!
न मुज्हको तुम ……..

बेदियो से जकद् रखा , मुज्हे बन्दी बना कर
बन्द कर दी जुवा , यू पावन्दी लगा कर !
मत बोलिये? टुम्हे बोलना नही आता
मेरे बोलने को वो , मेरी रिहाई समज्हता है !!
न मुज्हको …….

छोड सौतेलापन ! कब तलक रूथी रहेगी ?
मा कि ममता भी यहा ज्हूथी रहेगी !
तेरा बेता है ! उसे यू मा का प्यार दे
निर्मल मन से वो, तुज्हे अपनी माई समज्हता है !!
न मुज्हको ……….m

Anuj Tiwari
Indwar,Umaria MP

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