” मजदूर “

” मजदूर तू मजबूर है ,
पर जाना बहुत दूर है
रहीस जो तुझसे कतराते है
रहीसी पर इठलाते है !

हर उन रहीशों की छ्त तूने ही बनाई है ,
नदी जो खून पसीने की बहाई है !
उसी से सीचते वो गुलशन बहारों के,
जिस्म से तेरे बजे उनकी सहनाई है !!”
पर भूल मत ;-

हाथो पे तेरे करामाती ताकत है
कदमो की न दगमगाती चाल है !
मौत भी लौत जाये तुज्हे देख कर
वक्त कि तलवार पे तू धाल है !!

खुदा ने तुज्हे जो नेयमत अदा की है
जज्बा वो प्रसन्सनीय ही नही बन्द्नीय भी है !
तुज्हमे वो लालिमा है सूरज की
जो सदियो से जल रही आज भी लाल है !!

तेरी थिरकन से थिरकती ये धरा सारी
तेरी उल्ज्हन की दोर पे उलज्ही बसुन्धरा सारी !
तेरी तदफन को क्या समज्हेगे; ये खुदगर्ज है
मचलने पे तेरी आये भूचाल है !!

इरादे फौलादी दिखा कुच्ह कर के एसा
इसमे नाज हो आज सबको तुज्हपर !
बदल दे उस राग को इन्तजार मत कर
जो न भाए जिसपे न तेरी ताल है !!

तोद दे बेदिया तुज्हे बन्धकर नही रहना
आजाद पन्च्ही है तू तुज्हे उदते रहना है !
मुक्त गगन पे दिखेन्गी ये सामाजिक कुरीतिया
फैला दे ग्यान प्रकाश तुज्हे मिताना कुचाल है !!

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