चार तिनके जुटा घोंसला तो बना

चार तिनके जुटा घोंसला तो बना;
ज़िन्दगी का कहीं सिलसिला तो बना।

इक पहल एक रिश्ता बने ना बने,
जान पहचान का मामला तो बना।

कुछ कदम तुम बढ़े कुछ कदम हम बढ़े, ,
कर गुजरने का कुछ हौसला तो बना।

ज़िन्दगी एक ठहरी हुई झील है,
कर तरंगित कहीं बुलबुला तो बना।

सन्न सुनसान में एक आवाज दे,
गूँज से जोश का जलजला तो बना।

फ़िर बनाना कभी ताज सा इक महल,
प्यार में प्राण को बावला तो बना।

यह ज़माना नहीं है भला ना सही,
पर ‘भरद्वाज’ ख़ुद को भला तो बना

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