न जाने कैसे

न जाने कैसे
आज सुबह ही वो खिली थी ,
उसकी आँखे अभी अधखुली थी.
वो तो अभी कली थी ,
डालियाँ उसके आने से झुकी थी.
हवाएँ उसे झूला रही थी ,
उसके चमक में दुनिया चुंधिया गयी थी .
उसकी उमंगें हिलोरे मार रही थी ,
उसकी उमर अभी आधी अधूरी थी .
न जाने कैसे ,
उस पर एक जालिम की नज़र पड़ी थी .
उसे देखते ही वो उसे तोड़ गया था .
उसे बुरी तरह मरोड़ गया था .
उसके रस को वो निचोड़ गया था
अपनी बेबसी पे वो रो भी नहीं सकी थी .
उसकी चमक अब फीकी पड़ गयी थी
अब वो एक नाचनेवाली के बालो में गुंथी थी .

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