प्रण

हृदय में बाल्यावस्था से ही ईप्सा जागी
मैं भी उड़कर गगन को छू लूं
परन्तु यह कार्य सहज न था
क्योंकि सोचना व समर्थ होना भिन्न बात है
और भिन्न परिस्थितियों को इंगित भी करती है
हमने ईच्छओं की पुलिया तो खड़ी कर दी
सपने तो शीघ्रता से देख लिए
लेकिन इसे वास्तविकता में परिवर्तित करने हेतु
अथक परिश्रम की आवश्यकता थी
बालक तो हठी होते हैं
भला वे दूसरे की सुनते कहाँ हैं
हमने भी बालपन किए व ठोकरें खाई
तब जाकर अनुभव हो सका कि
हमारे पंख ही कहाँ हैं
ताकि मैं उड़कर गगन को छू सकूँ
तब अपनी बातों पर निराशा हो गई
मगर धैर्य न खोया
और हृदय में विस्वास को सदैव अटल रखा
क्योंकि ज्ञात था कि
कभी तो पंख होंगे
दोबारा फिर प्रयत्न करेंगे
तब से अब तक गगन छूने की ईप्सा
हृदय में विराजमान है
इस मध्य अनेको उड़ान भरे और गिर भी पड़े
परन्तु प्रयास न छोड़ा
और अभी तक मैं उड़ तो नहीं सका हूँ
परन्तु संघर्ष का परिणाम यह निकला है कि
फुदकने अवश्य लगा हूँ
मन में विश्वास है कि वह दिन दूर नहीं है
जब मैं उड़ूँगा
और गगन को छू लूँगा
बस प्रतिक्षा है ।

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