मेरे रहगुजर में

मेरे रहगुजर में मुद्दतों से कब दीया जली
धुँआ उठता रहा धड़कनों में चिमनियाँ जली

अकेले घुटकर जीने का एहसास मुझको है
तनहा जब जब रोया तो सिसकियाँ जली

हर दिन किस कदर नींद आती है रात को
उनसे पूछिए, कि जिनकी आशियाँ जली

इस जहाँ में कितने अजीम आए और चल दिए
एक दिन वो भी जले और उनकी अस्थियाँ जली

उस जंग में तनहा मुफलिस ही नहीं लुटे गए
उस आग में कितने सिकंदरों की हस्तियां जली

उस से बिछड़कर जब और से सगाई होने लगी
बदन की हल्दियाँ जली हाथों की मेंहदियाँ जली

ऐसा था वो चिराग जिसे बुझाने की चाह में
हर मर्तबा शिकस्त खाकर वो आँधियाँ जली

4 Comments

  1. Dushyant Patel 11/05/2015
  2. sanjay kumar maurya sanjay kumar maurya 11/05/2015
  3. ghanshyam singh birla 11/05/2015
  4. sanjay kumar maurya sanjay kumar maurya 12/05/2015

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