रेगिस्तान के पौधे

हम देखते आए हैं
इन अधसूखे पीले पड़े
अधमूए झुरमुटों को
रेत के ऊँचे ऊँचे टीलों पर
जहाँ सिर्फ धूल की आँधी है
सूरज के मुख से निकलती
अंगार स्वरूप गर्मी है
सब निर्जन है
ऊसर है
जहाँ वन्य जीवन की
कल्पना भी दूभर है
वहां ये झुरमुट
सरल हैं
दृढ. संकल्पी हैं
आशावादी हैं
और स्वयं को परिस्थिति अनूरूप
ढालने को प्रयत्नशील हैं
भले ही इन्हे वक्त से
खाद पदार्थ न मिले
कोई शिकायत नहीं
मुकद्दर से तृप्त हैं
दुख काटते जाते हैं
जीवन जीए जाते हैं
जीवन क्या है
कैसे जीते हैं
और जीए जाते हैं
आखिर गर्म मौसम खत्म होता है
दुख के बादल छँट जाते हैं
बरसात आती है
पानी की बूँद बरसाती है
पत्ता पत्ता खिल उठता है
उष्मा व शुष्कता त्याग देते हैं
और हरियाली से सँवर जाते हैं
नए नए कोपल व फूल निकलते हैं
देखकर लगता है मानो
मुस्कान से भरे हों
वे कहते हैं
भले रेगिस्तान में हमारा बसेरा है
यहां परिस्थितियाँ सदा अनुकूल नहीं रहतीं
फिर भी एक वक्त आता है
जब खुशियों से ओतप्रोत होते हैं
व निराशा त्यागकर
उत्साह से भर जाते हैं ।
मनुष्य की जिंदगी
एकदम ऐसी ही है
ऐसे ही सुख दुख आता जाता है
इससे
घबराना नहीं चाहिए
धैर्य रखना चाहिए
जीवन को गम्भीरता से जीना चाहिए
सुख दुख ही
जीवनरूपी सिक्के के
जो पहलू हैं ।।

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