कश्मकश

जिंदगी कट रही है
समय घट रही है
इंसानियत बट रही है

सबका रट यही है
अपना मुकद्दर यही है
यहाँ कुछ नहीं है

लुट रहा है ये मुल्क ये बस्ती
जिंदगी महँगी है और मौत सस्ती
आखिर हमारी भी है कुछ हस्ती
तुफानो से भी निकालेंगे कस्ती|

रचनाकार – नन्दकिशोर महतो

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