रुह

देखा नहीं कभी रूह को इसे महसूस हरपल किया हैं
जैसे कोहरे की भांति मुझे उसके होने का एहसास हैं

जैसे सूरज छुप जाता हैं इन घने बादलों के बीच
और फिर निकल आता हो जैसे झुरमुट से यूँ ही

खेल खेलता हैं ये अदृश्य रूह और ये चंचल मन
जैसे मैं हूँ इनके लिए बालपन का खिलौना कोई

रचनाकार – नन्दकिशोर महतो

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