हो हवाओं में तुम सब दिशाओं में तुम

हो हवाओं में तुम सब दिशाओं में तुम;
रम रहीं मेरे मन की गुफाओं में तुम।

झांकता हूँ शरद रात्रि में जब गगन,
दीखतीं चंद्रमा की कलाओं में तुम।

हो गया है निगाहों में कैसा असर,
मुझको लगती हो जलती शमाओं में तुम।

मैंने लिखने को जब भी उठाई कलम,
गीत ग़ज़लों में प्रहसन कथाओं में तुम।

जब भी मन्दिर में जाकर झुकाया है सिर,
मेरी माँगी हुई सब दुआओं में तुम।

पढ़ के देखा है वेदों पुराणों को भी,
वेदवाणी में तुम हो ऋचाओं में तुम।

जंगलों से गुजरते समय यों लगा,
पेड़ के संग लिपटी लताओं में तुम।

मेरे प्राणों में साँसों उसासों में ख़ुद,
खून बन बहतीं मेरी शिराओं में तुम।

ध्यान करते समय भी ‘भरद्वाज’ की,
भावनाओं में तुम साधनाओं में तुम।

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