श्री रामाष्टकम -राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

श्री रामाष्टकम

राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

राज्य किये मनु कोशल में बहु काल गए मन माहिं विचारा |
भूप कहै शतरूप प्रिये बिनु धर्म वृथा मम जीवन सारा ||
नैमिष तीर्थ प्रसिद्ध महा तप त्याग धरा तहँ भूप पधारा |
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

ब्रह्म अगोचर निर्गुण जो सुखराशि सदा अज विष्णु पियारा |
शम्भु सदा जेहि ध्यान करैं ऋषि देवन के तप का उजियारा ||
जासु स्वरूप भुसुंडि हिये मनु को वह रूप लगा अति प्यारा |
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

धेनुमती तट बैठि गए शतरूप व भूप तपी तनु धारा |
ध्यान करैं अखिलेश्वर का तन क्षीर्ण किया तप योग सँभारा ||
विष्णु महेश विरंचि सबै तहँ आइ कहे वर लेहु हमारा |
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

भूप न रंच डिगा तप से शतरूप तपी तन योग पसारा |
वेदन ने जेहि नेति कहा प्रकटा सोइ ब्रह्म अगोचर तारा ||
भूपति मांगु जो तोहि सोहाय प्रसन्न हुआ तप देखि अपारा ||
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

चाह न स्वर्ग न मोक्ष मिलै मोहि पुत्र मिलै तुम सा अति प्यारा |
ब्रह्म कह्यो मनु से नृप मैं बनिहौं तव पुत्र प्रतिज्ञ सितारा ||
देवि सती वर मांगि कही बन पुत्र प्रभो करना भव पारा |
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

भूप बहोरि बनें मनु थे दशरत्थ प्रसिद्ध सुदेह सो धारा |
रानि सयानि कौशिल्य बनी शतरूप पुनः तपरूप विचारा ||
राम प्रभो प्रकटे पर-ब्रह्म धरा पर भा प्रभु का अवतारा |
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

रानि निहारि रही सुत को पर-ब्रह्म चतुर्भुज रूप सँवारा |
आदि अनादि अखंड अभेद अगोचर गोचर सा अति न्यारा ||
निर्गुण ब्रह्म स्वरूप धरै पर-ब्रह्म सदा भक्तन रखवारा |
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

लंक में भीषण युद्ध हुआ रणकर्कश राम ने रावण मारा |
राम नमामि नमामि प्रभो तुमने ऋषि गौतम नारि को तारा ||
दीन मलीन हुआ शिव दास बनों रघुनंदन आप सहारा |
राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
९४१२२२४५४८