मिलन के लिए

मिलन के लिए ,
आज हंसनी फिर बैचेन है.
निशा के उस प्रहर के इन्तजार में ,
सावन की उस पहली बून्द के इन्तजार में,
प्रेमगान के लिए,
आज हंसनी फिरबैचेन है.
नदी के किनारे,
रेत में ,
अपने प्रियतम के आगमन की,
दस्तक सुनने के लिए,
आज हंसनी फिर बैचेन है .
सुबह से हैं संध्या का इन्तजार है.
रात का पसरा सन्नाटा ,
उस सन्नाटे में दो हंसो का जोड़ा,
आज कई वर्सो के बाद
पेड़ की डाल पर,
आलिंगनबद्ध है
दुर्भाग्य हंसनी का ,
वो भूल गयी बहिलये को ,
जिसने उससे छीन लिया ,
आज फिर उसका प्रियतम .
उसके प्रेमगीत,
बदल गए अब अश्रुगान में.
शोक संतप्त हंसनी ,.
देख रही अपने प्रियतम को जाते हुए .
देख रही अपने सपने को टूटते हुए .
उसका मिलन अधूरा ही रहा.
उसका जीवन पूरा ना हुआ.
सावन की बुँदे अब उसे जला रही है.
निशा का ये प्रहर ,
उसके विरह गान से सुबह होने का दस्तक दे रहा है.

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