धूप की मार

चिलचिलाती धूप में,
वो गर्म हवाओं की लू में,
चले जा रहा हूँ
सिर पर छाता नहीं,
पैर में जूता नहीं,
रुक जाता हूँ
पेड़ की छांव में,
दो घड़ी के लिए,
दो घूंट पानी के लिए,
मुँह धोने के लिए,
लगी पेट में आग,
भूल गया सब बात,
आ गई घर की याद,
फिर चलने लगा मैं,
उन गर्म हवाओं में,
वो हवा भी ठंडी लगी,
जब दाल रोटी की याद ,
मुँह में मिस्री सी घुली |

बी.शिवानी

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