मानवाधिकार

सड़क की पटरी
रैन बसेरे
झुग्गी झोपड़ी
की आबादी,
रात हुयी तो
ऐसे लगती,
जैसे किसी ने
लाश बिछा दी ,

कचरों में
जीवन तलाशते,
जूठे पत्तल
दोने चाटते ,
भूखे पेट
भिक्षा या शिक्षा
बच्चों को भी
कैसी सज़ा दी,

कहाँ गया
मानवाधिकार
मानवता को
भी धिक्कार,
बांस ,सिरकी ,
सरपत के बसेरे
घोर तमस
जीवन को घेरे
दबी चीख रही कराह
मालिक कैसी
दुनिया बना दी …….

अनिल कुमार सिंह