द्रौपदी

शीर्षक – द्रौपदी
सफ़ेद साडी में लिपटी द्रौपदी ,
अँधेरी कोठरी में बैठी हुई,
उजाले के इन्तजार में ,
ढूंढ रही है ,
चन्द्रमा को,
अमावस्या के दिन .
उलझे केशो से घिरी द्रौपदी ,
चुड़िओं के टूटे टुकड़ो के बीच बैठी हुई ,
ढूंढ रही है,
सूरज को,
कोहरो के बीच .
आईने में खुद को निहारती द्रौपदी ,
उजाले के इन्तजार में ,
ढूंढ रही है ,
अपने कृष्ण को,
सैकड़ो दुःशाशनो के बीच .
दुर्भाग्य द्रौपदी का ,
नहीं मिला उसे कोई कृष्ण ,
फिर टूटी उसकी मर्यादा ,
कैसी लड़ेगी ,
पांडवो के बिना ,
महाभारत की लड़ाई ,
अकेली बेचारी,
द्रौपदी.