श्री गणेश चालीसा

गणपति का कर ध्यान कहूं गणपति चालीसा |
शारद दो वरदान दया करिए वागीशा ||
आदि देव गणनाथ कृपा कर दो गणनायक |
शरणागत शिवदास सिद्धि दो सिद्धि विनायक ||

गणनाथ गजानन की जय हो |शिवपुत्र प्रभो करुणामय हो ||
प्रथमेश्वर ईश्वर आदि प्रभो |जगदीश्वर श्रेष्ठ अनादि विभो ||
गुणकानन पाषिण विघ्न हरो |हम आर्त हुए शुभ दृष्टि करो ||
तुम भूपति गौरि सुपुत्र अहो |प्रिय मूषक वाहन सिद्ध रहो ||
गणनायक रक्त हरिद्र प्रभो |सुर श्रेष्ठ सुरेश्वर शाभवि हो ||
गण श्रेष्ठ उदण्ड निधीश्वर हो |भगवंत मनोमय ईश्वर हो ||
करते तुम पूर्ण मनोरथ हो |तुम हो गणनाथ अखूरथ हो ||
गुणज्ञान निधान सुजान विभो |शरणागत वत्सल दन्ति प्रभो ||
गिरि छोड़ चले शिवशम्भु कहीं |गिरिराज किशोरि अकेलि रहीं ||
सखियाँ बुलवाइ कहै गिरिजा |हमने नव उत्सव है सिरिजा ||
सब नाचहु गावहु गान करौ |मन में नवरंग बसंत भरौ ||
सुनि गौरि गिरा हरषीं सखियाँ |सकुची सखि एक घुमा अखियाँ ||
शिव के गण श्रेष्ठ अनेक रहे |मुसुकाइ सखी असि बात कहे ||
झकझोर गया अति व्यंग्य महा |तब बैन षडानन मातु कहा ||
रचिहौं गण एक प्रचंड बड़ा |रहिहै वह रक्षक द्वारे खडा ||
शिशु का प्रतिमान स्वरुप रचा |गिरिजा मनु मोदु विनोदु मचा ||
बलवान सुधी सुत को सिरिजा |सखि संग प्रसन्न हुई गिरिजा ||
अति सुन्दर बालक रूप रहा |जय माँ गिरिजा तुतुलाइ कहा ||
जगदम्ब प्रणाम सहस्र करूं |तव आयसु को निज शीश धरूँ ||
गिरिजा समुझाइ कही सुत को |करिए तुम पूर्ण मनोरथ को ||
नव उत्सव आजु विशेष ठना |घर में नहि आवै कोइ जना ||
धरि आयसु शीश गणेश खिले |शिव शम्भु उमापति द्वारे मिले ||
शिवशंकर द्वार प्रवेश किये |गणनाथ उन्हें तब रोक दिये ||
पहचान किये शिव कौतुक ही |जननीं मम गौरि गणेश कही ||
गिरिजापति मैं शिवशंकर हूँ |तुम हो शिशु मैं प्रलयंकर हूँ ||
प्रिय पुत्र हटो मम मारग से |कहि मूर्ख उदण्ड महेश हँसे ||
पितु आप क्षमा मुझको करिये |प्रिय मातु रजायसु को धरिये ||
तब क्रोध जगा शिवशंकर को |फिर छोड़ चले शिव थे घर को ||
गण शम्भु प्रचण्ड बुलाइ लिये |रण भीषण श्रेष्ठ गणेश किये ||
अज विष्णु सुरेश पराजित थे |शिव के गण भी अति लज्जित थे ||
शिव शूल प्रचण्ड प्रहार किये |गणनायक का सिर काट दिये ||
गिरिजा प्रलयंकर रूप धरी |महि देव ऋषीश्वर पाहि करी ||
मम जीवित पुत्र गणेश्वर हो |सुर पूजित हो प्रथमेश्वर हो ||
सुर श्रेष्ठ सभी यह मान लिये |गज शीश लगाकर प्रान दिये ||
विधि विष्णु प्रसन्न महेश्वर थे |सुर पूजित श्री प्रथमेश्वर थे ||
जय सिद्धि विनायक क्षेमकरी |प्रिय रूद्र यशस्कर विघ्नहरी ||
जय नाद प्रतिष्ठित नन्दन जी |प्रिय बुद्धि तुम्हें अभिनन्दन जी ||
जय श्रेष्ठ गणेश महाबल की |जय विघ्न विनाशन के दल की ||
जय कीर्ति कवीश कृपाकर की |जय मंगल मूर्ति गदाधर की ||
शरणागत है शिवदास प्रभो |गुणज्ञान निधान सुजान विभो ||

करो पाठ चालीस गणनायक का ध्यान कर |
गिरिजा पुत्र कवीश रिद्धि सिद्धि देते सदा ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9412224548

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