कविता -स्वाभिमान

क्षमा क्यूँ माँगूँ
हाथ जोडूँ
मन को तोडूँ
केवल तुम्हारा, रखूँ मान
इसलिए कि मैं स्त्री हूँ !
मैं विवश रहूँ
न लूँ साँस
न खोलूँ पर
न देखूँ आसमान !
सपनों का आवागमन रोक दूँ
प्रवाह रोक दूँ विचारों का
हाथ जोड़ कर माँगूँ क्षमा
अपने अस्तित्व की करूँ याचना
खूँटी पर टाँगकर स्वाभिमान !
निस्तेज नहीं हूँ मैं !
संघर्ष होगा ,होने दो
स्वीकार है !
पर घुटने टेक दूँ
सामने तुम्हारे
ऐसे जीवन पर
धिक्कार है !!

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया DKNIVATIYA 02/05/2015
  2. rakesh kumar rakesh kumar 03/05/2015

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