छोटी-सी बात पर

सेचता हूँ
लिखूं एक गीत
किसी छोटी सी बात पर !
सुना है
बड़ी-बड़ी बातों पर
लिखे गये हैं बड़े-बड़े गीत
परन्तु
छोटी बात,
क्या वास्तव में छोटी होती है ?
खान-पान और मद्यपान पर
क्यों लिखूँ मैं गीत,
क्या यही है कलम के संसार की रीत?
जब बिक रही हो जिंदगी
रोटी के दो टुकड़ों के लिए
तब शाही व्यंजनों की व्यंजना
कलमकार का धर्म नहीं है,
सिर्फ अभिधा से
इन पर किया जा सकता है वार
मैं गीत लिखता हूँ हर बार !

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