“दूर बस खड़े रहे”

प्रेमी युगल नए-नए
स्नेह में बहे-बहे
स्वतंत्र स्वाभिमान से
गीत कुछ कहे-कहे
आज जात-पात से
मतलबी समाज से
हार गए प्रेमी दोनों
काबा और प्रयाग से
आज अपनी हार पर
शर्म से जड़े रहे
नीर नयन में भरे
दूर बस खड़े रहे

प्रीती से बंधे-बंधे
प्रेम से लदे-लदे
थे सफल भविष्य रथ में
साथ ही सधे-सधे
थोड़े रूढ़िवाद से
थोड़े जातिवाद से
इस सदी के साहूकारों
के मिथक-विवाद से
खेमों में बंटे-बंटे
क्षोभ में पड़े रहे
नीर नयन में भरे
दूर बस खड़े रहे

मौलिक कृति
“भारद्धाज”

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