एक और किसान कुर्बान हुआ।

राजनीति की बेदी पर एक और किसान कुर्बान हुआ।
ठुकराया जिसे धरती ने ,बेदर्द बहुत आसमान हुआ।

सोचा था अब वक़्त आ गया दुःख सारे मिट जायेंगे
मगर गीली माटी में मिल ओझल निज अरमान हुआ।

लाशों पर बिछा हुआ बिस्तर काले नोटों का।
कब थमेगा सिलसिला इन मासूम मौतों का?

जिस दिल में सपने पलते थे दिल का दौरा पड़ गया।
जिस बदन ने सींचा खेतों को जहर से नीला पड़ गया।

परिजन के आंसू सूख गए,सिसकियाँ भी दम तोड़ रहीं
झूठे वादों ने मुहँ फेर लिया ,बोझ कर्ज का बढ़ गया।

रक्त से भरता रहेगा बैंक सत्ता के वोटों का।
कब थमेगा सिलसिला इन मासूम मौतों का?

आत्महत्या के बाद जो तुमने धन देने का ऐलान किया।
आधा ही दे देते पहले,क्यूँ दाता का घर शमशान किया?

प्राकृतिक आपदा पर तो मनुष्य का है नहीं जोर कोई
मुर्दे को पानी पिला कर तुमने कौन सा एहसान किया?

दीन दुर्दशा किसान की दर्द कराह उठा होंठों का।
कब थमेगा सिलसिला इन मासूम मौतों का?

वैभव”विशेष”

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया dknivatiya 25/04/2015
  2. Bimla Dhillon 25/04/2015
  3. vaibhavk dubey वैभव दुबे 25/04/2015
  4. Dr Manoj Sharma 05/06/2015

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