दरख्त के साये में…

दरख्त के साये में सपोलों का एक झुंड देखा,
परिंदा कोई उस शाख पर रहता होगा।

बेइज़्ज़त रोज़ होता है अपने बेटों से वो,
खून के घूँट पीकर भी जुर्म सहता होगा।

दिखता है रोज़ मुझे वो पसीने से लथ पथ,
कोई सूरज उसके घर के पास बहता होगा।

जवानी में बचा लेता कुछ तो ये नौबत न आती,
दिल भी यही उसका अब कहता होगा।

दार-उल-ज़ईफ़ में लगी थी नवासों की तक़रीब,
वक़्त भी औलादों पे आज हँसता होगा।

[ दार-उल-ज़ईफ़ = old age home
नवासों = grandchildren
तक़रीब = festival or fair(मेला) ]

— अमिताभ ‘आलेख’

2 Comments

  1. vaibhavk dubey vaibhavk dubey 25/04/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 25/04/2015

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