बेटियां

      लाख जलाओ घी के दीपक
      रोशनी के लिए
      बिन बेटी के घर में
      उजाला कहा होता है !!

      जग के लोग कहते
      बेटा “घर का चिराग” होता है
      फिर बेटी की विदाई से
      आँगन सुना क्यों होता है !!

      हर कोई कहता आज
      बेटा बेटी एक समान होता है
      फिर बेटी के जन्म पर
      बेटे सा उतसव क्यों नही होता है !!

      जिस बेटे को दुआओ से मांगता
      वो हर दौलत का हकदार होता है !
      बोझ समझता था जिस बेटी को
      मरने पर निस्वार्थ मन उसी का रोता है !!

      बचपन से बूढ़े तक
      जन्म से लेकर मरण तक
      किसी न किसी रूप में
      साथ निभाती है बस बेटियां !!
      !
      !
      !
      डी. के. निवातियाँ _!!!!

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