कवि और दीपक

ऐ दीप! तू क्यों जलता है ?
क्यों तिल -तिल कर.
अपना सर्वस्व लुटाता है ?
जग की राहें उजियारी कर
जीवन अपना अन्धकार बनाता है ?

हूं दीप -तभी तो जलता हूं –
जीवन ज्योति बिखराता हूं –
भूलों को राह दिखाता हूं –
जलना तो है कर्म मेरा –
बिन ज्योति के मैं दीप कहां ?

मैं जलता हूं तो मिटता हूं –
कवि ! सत्य कहा तुम ने,
जीवन का नाम तो मिटना है,
जब मिटना है तो रोना क्या ?
हंस -हंस के मिटाओ जीवन -धन
इस धन से अपना होना क्या ?

_______ बिमल
(बिमला ढिल्लन)

One Response

  1. rakesh kumar rakesh kumar 19/04/2015

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