रेत है खाली

समंदर पे चमकती धूप, किनारे रेत है खाली!
हसीं मंज़र नहीं दिखते, अगरचे पेट है खाली!

तू क्यों रूठ कर बैठा है दुनिया देखने वाले!
कहीं है बाढ़ का पानी, कहीं सूखे खेत हैं खाली!

बदनसीबी है के मुफ़लिस के कभी क्यों गम नहीं घटते!
जरूरत की सभी चीज़ों के बढ़ते रेट हैं खाली!

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