धुंधले से

ग़ज़ल

धुंधले से नज़र आते हैं किनारे हमको ,
छोड़ देना नहीं लहरों के सहारे हमको |

जो भी कहना है मुझे, सादगी से कह डालो ! ,
बदगुमाँ करते हैं आँखों के इशारे हमको |

अधूरा ख़्वाब था जो इश्क़ की तरह था ‘सहर’
कहे पागल कोई! आशिक़ ना पुकारे हमको |

Leave a Reply